चीखें भी खामोश हो रही हैं। वह बच्ची…अभी सिर्फ छह साल की है
दिव्य चिंतन
गौहरगंज में -
जुल्मों-सितम की हद हो गई, हुज़ूर ! !
हरीश मिश्र
गौहरगंज…का अर्थ होता है मोती का बाज़ार,
लेकिन जुमे की रात को एक मोती नहीं, एक मासूम ज़िंदगी लूट ली गई।
हुज़ूर! के संसदीय क्षेत्र कस्बों में ,तहसीलों में, गांवों में, गलियों में जुल्मों-सितम की हद हो रही है। अपराधी , दुष्कर्मी बैखोफ हैं। कमल की पंखुड़ियों को दरींदे मसल रहे हैं । गुंजन से पहले, सरगम का गला घोंट रहे हैं। चीखें भी खामोश हो रही हैं।
वह बच्ची…अभी
सिर्फ छह साल की है।
जुमे की शाम तक हिरनी की तरह कुलाचें मार रही थी, चेहरा ऐसा कि जैसे किसी कमल की पंखुड़ी पर सुबह की ओस टिकी हो। उसे चूड़ी की खनक क्या होती है,पता नहीं।
पायल की छम-छम और मेहंदी का रंग अभी दूर की बातें थी। इतिहास की किताबों में दर्ज जालिमों के ज़ुल्म की कहानियां उसने अभी पढ़ भी नहीं पाई थी।
वह जुमेरात की रात थी…हिंदू पंचांग अनुसार चंद्र मास का पहली रात, मासूम के जीवन की आख़िरी रात बन गई।
सलमान नाम का एक शैतान टॉफी दिखाकर उसे बहलाकर ले गया। वह उसे ‘चाचा’ कहती थी, उसकी दुनिया इतनी छोटी थी कि उसे नहीं पता था,
चाचा के वेष में शैतान सामने खड़ा है।
... सलमान ने ज़ुल्मी, जाहिल मानसिकता का परिचय देते हुए, मामा की लाडली को सुनसान जगह में ले जाकर, बर्बरता से नोंचा। अर्ध अंकुरित बीज को कुचल दिया गया।
हुज़ूर! के संसदीय क्षेत्र में बेटियों की पीर कौन सुनेगा ? जो बच्ची कल तक कुलाचें मारती थी पूरी तरह से घायल है। बेटियां डरी हुई हैं,
माँ-बाप की नींद उड़ चुकी है और पूरे संसदीय क्षेत्र की मुस्कान खतरे में है और हैरानी देखिए,
जिन्हें बोलना चाहिए था,
वे संसदीय क्षेत्र में रस्सी पकड़ कर एक दूसरे को खींचने का खेल खेल रहे हैं, न गुस्सा, न गैरत।
मानो ज़ुल्म का ये मौसम
उनकी रोज़मर्रा की दिनचर्या बन चुका है।
लेकिन जब नेतृत्व चुप हो जाए, तब जलते अंगारों को सड़कों पर उतरना पड़ता है , सन्नाटा तोड़ना पड़ता है क्योंकि सहनशीलता कायरता है।
हुज़ूर ! कमल की पंखुड़ियां यूं ही दरिंदों के पैरों तले मसलती रहें, ये अब नहीं चलेगा। ठंड में अलाव जल रहे हैं, इन अलावों में से नफरत की चिंगारी निकल रही है, जो घास फूस से लेकर लोहे को भी पिघला सकती है। अग्नि में अक्षय शक्ति का भंडार होता है और विनाश का भी। पुलिस, प्रशासन और सरकार को इस घटनाक्रम को गंभीरता से देखना चाहिए। यदि गंभीरता से नहीं देखा तो परिणाम अमंगलकारी, अनर्थकारी आ सकते हैं।
महाभारत में देवकीनंदन, सृष्टिकर्ता , शिशुपाल की गलतियों को शिशु के रूप में नजर अंदाज करते हैं, लेकिन जब वह पाप की सीमा के पार हो जाती है, तब वे उस दुराचारी को एक ही सजा देते हैं, दुराचारी का सर तन से जुदा।
अब सरकार से अपेक्षा है, ऐसे दुराचाियों को दंड देने के लिए संविधान में संशोधन किए जाएं, कठोर कानून बनाए जाएं। जिस आंगन में ऐसे दुराचारी खेले, उस आंगन को जमीं दोज किया जाए,
हर दुराचारी की एक ही सजा, सर तन से जुदा तभी जुल्मों-सितम बंद होंगे।
लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )


