दिव्य चिंतन 

( हरीश मिश्र ) भगवान का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म के उन्मूलन के लिए ही होता है।
जहां कहीं भी अनीति दिखाई देती उसके विरुद्ध दिव्य अस्त्रों  का प्रयोग कर, दिव्य घोष करने, अनैतिक और दुष्ट प्रवृत्तियों को मिटाने भगवान परशुराम पहुंच जाते थे।

     अनीति का विरोध करना मानवता का पवित्र कर्तव्य है । इसके बिना नीति का समर्थन हो ही नहीं सकता।

    इसका उल्लेख पुराणों में मिलता है कि समाज को क्षति पहुंचाने वाले अनैतिक शासन के विरुद्ध और धर्म राज्य की स्थापना करने के लिए ,अन्यायी शासन व्यवस्था से भगवान परशुराम ने 21 बार युद्ध किए ।  प्रजा को मुक्त कराया। 

    सहस्रबाहु उस समय अनीति पूर्ण शासन का प्रतीक था। कथा अनुसार उसकी दो भुजाएं सहस्र भुजाओं के समान शक्तिशाली थी। अपनी अनीतियों के आगे वह किसी की नहीं सुनता था। महर्षि जमदग्नि ने उसे नीति युक्त शासन करने के लिए समझाया। वह क्रोधित हो गया और उन्हें मृत्यु के घाट उतार दिया। 
महर्षि जमदग्नि की अग्नि से प्रज्जवलित भगवान परशुराम ने अनीति के प्रतीक सहस्रबाहु  की सत्ता का अंत किया। वे जानते थे कि अन्याय का विरोध करना ही पवित्र धर्म है। इसीलिए उन्होंने संकल्प लिया कि जहां उदंडता होगी वहां परशुराम अपने परशु से राम राज्य की स्थापना करेंगे।

      समाज की सोच है कि महानता का अर्थ सीधा-साधा और दयालु होना है। यह सोच  अनुचित है। मनुष्य के पास शौर्य, साहस और दृढ़ता का गुण भी होना चाहिए। जब कोई विनम्रता को कायरता समझने लगे तो परशुराम बन कर ऐसी अहंकारी प्रवृत्ति  को दंडित करना चाहिए। उद्दंड को जो दंड दे वह परशुराम।

     आज का पर्व धर्म स्थापना के लिए अनीति के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प लेने का अक्षय पर्व है।

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