दिव्य चिंतन

दियासलाई 

हरीश मिश्र ( 9584815781)

    विदिशा की मिट्टी में कुछ ऐसा है, जो समय-समय पर “चिंगारी” को जन्म देती है । यही वह धरती है जिसने कैलाश सत्यार्थी जैसे व्यक्तित्व को गढ़ा...एक ऐसा नाम, जिसने दियासलाई जलाकर अंधेरे से सीधे टकराने का साहस किया। उनका संदेश सरल था, लेकिन असहज करने वाला “ जब तक बच्चों के हाथों में किताब की जगह औजार हैं, विकास अधूरा है। ”
   यह दियासलाई रोशनी के लिए जली  और जब रोशनी फैली, तो उसने दुनिया को बच्चों की आंखों में छिपे अंधेरे से परिचित कराया।
    लेकिन फिलहाल विदिशा से एक और दियासलाई जली  है, नाम है, प्रियंक कानूनगो, ( राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सदस्य )
   उनका रास्ता अलग है, मकसद अलग है, मुद्दे अलग हैं, मंजिल भी अलग और जुबां कहीं अधिक तीखी है...
उनकी जुबां से निकले शब्दभेदी बाण अतीत के ज़ुल्म की दास्तान सुनाते प्रतीत होते हैं…। "
    उनके शब्द फूल को अंगारे बनाने की क्षमता रखते हैं। सोशल मीडिया पर उनके द्वारा उठाए मुद्दों पर बहुत बहस होती है। उनकी पोस्ट पर  आलोचक लिखते हैं " जनाब आपकी जुबां पर पोटेशियम क्लोरेट, एंटीमनी ट्राइसल्फाइड और कांच के चूर्ण का मिश्रण है। जिससे आप इंसानियत के रिश्तों को जला रहे हैं।
   वे इतिहास में किए गए ज़ुल्म, सामाजिक विसंगतियों, सांस्कृतिक पुनर्स्थापन, धर्मांतरण, जनसंख्या असंतुलन, लव-जेहाद , लेंड जिहाद और महिलाओं की सुरक्षा जैसे विषयों पर मुखर रहते हैं। उनके हजारों प्रशंसक और विरोधी हैं। उनके प्रशंसक  उनकी पोस्ट पर लिखते हैं " आपका कार्य देखकर नायक फिल्म के अनिल कपूर की याद  आ जाती है। बहुत बढ़िया कार्य कर रहे हैं आप , हर गरीब, असहाय व्यक्ति की मदद करते देख दिल खुश हो जाता है। " एक अन्य समर्थक  लिखते हैं " एक ही दिल है प्रियंक भैया, कितनी बार जीतोगे आप।"
    यहां से कहानी दिलचस्प नहीं, बल्कि जटिल हो जाती है।
एक ही जमीं , एक ही प्रतीक “दियासलाई” दो अलग रास्तों में विभाजित हो जाता है। एक रोशनी का माध्यम बनती है, दूसरी ताप और तपिश का।
    कानूनगो के समर्थक
उनकी कार्यवाहियों को संवैधानिक हस्तक्षेप मानते हैं, उनका कहना है अन्याय-अत्याचार का प्रतिरोध क्या मानव धर्म नहीं है ? जबकि अल्प विरोधी उनकी गतिविधियों को मानवता विरोधी मानते हैं। उनका कहना है मानव अधिकार पर सबका संवैधानिक अधिकार है, फिर संवैधानिक पद पर पदस्थ सदस्य भेद-भाव कैसे कर सकता है ?

    वह औंचक निरीक्षण में  सायरन और अपनी शब्द शक्ति से कालांतर में पीड़ित पक्ष को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
उनके कदम  वहां पड़ रहे  हैं , जहां सत्ता में बैठे मंत्रियों ने जनसमुदाय का विश्वास तोड़ा है। वह बहुसंख्यक समुदाय के युवाओं की एक ऐसी आवाज़ बनकर उभरे हैं , जो इतिहास के कुछ कालखंडों को सांस्कृतिक आघात के रूप में देखने वाले पीड़ित समुदाय को सुरक्षा का एहसास  दिलाती है। उनके समर्थक उनकी भाषा को सामाजिक शुद्धि और प्रतिरोध की आवाज़ मानते हैं।
    कल तक जिन तालाबों पर अवैध कब्जाधारियों की पताका लहरा रहीं थीं,
आज वहां मछुआरा  समाज की ध्वजा लहरा रही है। कानूनगो ने अभी तक जो भी कार्रवाई की हैं वह इतिहास में सड़े हुए अंगों की शल्यक्रिया है। वह खुद व्यवस्था की  आलोचना करते हैं और सोशल मीडिया पर लिखते हैं " गौ मांस के व्यापारी-गाय के हत्यारे हमारी ही मूर्खता से पनपते हैं !
    वह कहते हैं " मैंने जिस सनातन धर्म में जन्म लिया है उसकी परंपराओं को न तो अनदेखा किया जा सकता है और ना ही बदला जा सकता है। हमारे वंशजों ने इतनी कीर्ति पताकाएं फहरायी हैं कि युद्ध भूमि की धूल भी झुक झुक कर प्रणाम करती थीं, मैं तो उस ध्वजा को पुनः स्थापित कर रहा हूं।
    वहीं अल्प आलोचक उन्हें एक ऐसी दियासलाई मानते हैं, जो संवाद की जगह टकराव को जन्म देती है, एक ऐसी आग, जो अल्पसंख्यकों के भीतर असुरक्षा का भाव जगाती है।
   यह द्वंद्व नया नहीं है। हर युग में “आवाज़” और “आक्रोश” के बीच की रेखा धुंधली होती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज यह रेखा सोशल मीडिया और राजनीतिक विमर्श के बीच और भी तेज़ी से खिंचती-मिटती रहती है। राजनैतिक समीक्षक मानते हैं कानूनगो जिस राह पर चल रहे हैं वह विधानसभा और लोकसभा की चौखट की और जाती है, उनका ध्येय और मंजिल स्पष्ट है।
   प्रश्न व्यक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का है।
क्या बहुसंख्यक समाज दियासलाई को केवल इसलिए स्वीकार करे,  क्योंकि वह हमारे पक्ष में जल रही है ? या उससे यह भी पूछेंगे कि यह दियासलाई किसका घर रोशन करेगी और किसका जला देगी ? ”
क्योंकि दियासलाई पर लगे रासायनिक तत्वों का गुण है कि वह जब माचिस के संपर्क में आती है तो घास फूस से लेकर लोहे जैसी धातु को भी भस्म कर पिघला देती है। इसमें अक्षय शक्ति का भंडार है,जिससे अंधकार में रोशनी भी हो सकती है और सर्व संहार भी।
    समाज को बदलने वाली हर चिंगारी अपने साथ जोखिम भी लाती है। रोशनी और आग एक ही दियासलाई से उत्पन्न की जा सकती है।
   पश्चिम बंगाल इसकी एक जीवित मिसाल बनता जा रहा है, जहां वर्षों से राजनेताओं, धार्मिक नेताओं और मजहबी नेताओं ने तीखे वक्तव्य दिए, जिससे  समाज के भीतर  अविश्वास का जन्म हुआ, अब सामान्य विवाद भी साम्प्रदायिक तनाव में बदल जाते हैं।
    मंचों पर बोले गए शब्द नेताओं के लिए केवल भाषण हो सकते हैं, लेकिन भीड़ उन्हें संकेत की तरह ग्रहण करती है। परिणामतः मरता आम आदमी है, जलता समाज है और बच निकलते हैं वे हाथ, जिन्होंने दियासलाई जलाई थी।
    चिंता केवल इतनी है कि विदिशा की यह दियासलाई रोशनी तक सीमित रहे, आग न बन जाए।
   अंततः निर्णय चिंगारी का नहीं, उसे हवा देने वाले हाथों का होता है कि वह दीप बनेगी या दहन!!

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )